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Friday, December 20, 2024

1995: कराची से अफगानिस्तान तक की जिहादी राजनीति का उथल-पुथल

 

1995 कराची से अफगानिस्तान तक की जिहादी राजनीति का उथल-पुथल
1995: कराची से अफगानिस्तान तक की जिहादी राजनीति का उथल-पुथल


1995: कराची से अफगानिस्तान तक की जिहादी राजनीति का उथल-पुथल

फरवरी 1995 का महीना था। कराची के लियाकताबाद में एक मेला चल रहा था। लोग पैदल, बसों और गधा गाड़ियों से मेले में आ-जा रहे थे। मेले से थोड़ी दूरी पर कुछ लोग "कश्मीर बनेगा पाकिस्तान" के पोस्टर और झंडे लेकर जिहाद के समर्थन में चंदा मांग रहे थे। अचानक, एक कार से गोलियां बरसने लगीं, और जिहाद का समर्थन कर रहे कई लोग मारे गए। ये गोलियां किसने चलाईं, मरने वाले कौन थे, और इस घटना का आज से क्या संबंध है? आइए, इस पर गहराई से चर्चा करें।

हरकत-उल-अंसार और हक्कानी नेटवर्क का उदय

1995 की इस घटना में मारे गए लोग हरकत-उल-अंसार संगठन से जुड़े थे। यह संगठन अफगान जिहाद के दौरान जलालुद्दीन हक्कानी और उनके भाई खलील हक्कानी के साथ मिलकर काम कर रहा था। इस्लामिक चरमपंथ को बढ़ावा देने वाले इस संगठन ने उन सरकारों के खिलाफ जिहाद का आह्वान किया, जिन पर सुन्नी मुसलमानों के उत्पीड़न का आरोप था।

जलालुद्दीन हक्कानी ने 1980 के दशक में हक्कानी नेटवर्क की स्थापना की। यह नेटवर्क तालिबान शासन का हिस्सा बन गया। 1999 में, अमेरिका ने अफगानिस्तान में हक्कानी नेटवर्क के ठिकानों पर बमबारी की। इसके बावजूद, जलालुद्दीन हक्कानी ने ओसामा बिन लादेन को अमेरिका के हवाले करने से इनकार कर दिया।

तालिबान और हक्कानी नेटवर्क के बीच दरार

2021 में अफगानिस्तान पर तालिबान का नियंत्रण हुआ। खलील हक्कानी और उनके भतीजे सिराजुद्दीन हक्कानी ने तालिबान के नेतृत्व में प्रमुख भूमिका निभाई। हालांकि, सुप्रीम कमांडर हीबतुल्लाह अखुंदजादा और हक्कानी गुट के बीच तनाव बढ़ने लगा। हाल ही में खलील हक्कानी की हत्या के बाद यह दरार और गहरी हो गई। इस हत्या के लिए इस्लामिक स्टेट खुरासान ने जिम्मेदारी ली, लेकिन इसके पीछे कई अन्य संभावनाएं भी हैं।

हक्कानी नेटवर्क और अंतरराष्ट्रीय राजनीति

1970 के दशक में अफगानिस्तान में कम्युनिस्ट शासन था। पाकिस्तान ने सुन्नी चरमपंथियों को समर्थन देकर अफगानिस्तान को अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश की। 1980 के दशक में अमेरिका और सऊदी अरब ने इन जिहादियों को हथियार और वित्तीय सहायता प्रदान की।

सोवियत संघ की हार के बाद, हक्कानी नेटवर्क ने सऊदी अरब के जिहादियों पर निर्भर रहकर अपना संचालन जारी रखा। 2001 में तालिबान सरकार गिरने के बाद, हक्कानी नेटवर्क ने पाकिस्तान के मीरनशाह में अपने ठिकाने बनाए। यहां से उन्होंने आत्मघाती हमलों और बम धमाकों का संचालन किया।

वर्तमान संदर्भ: खलील हक्कानी की हत्या और इसके नतीजे

खलील हक्कानी की हत्या तालिबान और इस्लामिक स्टेट के बीच बढ़ते संघर्ष का संकेत है। इस घटना ने अफगानिस्तान और पाकिस्तान में जिहादी राजनीति को और जटिल बना दिया है। पाकिस्तान में तहरीक-ए-तालिबान के हमले तेज हो गए हैं, और हक्कानी नेटवर्क के अंदरूनी मतभेद उजागर हो रहे हैं।

निष्कर्ष

खलील हक्कानी की हत्या न केवल तालिबान और हक्कानी नेटवर्क के लिए एक बड़ा झटका है, बल्कि इससे पूरे क्षेत्र में जिहादी राजनीति पर असर पड़ेगा। पाकिस्तान, अफगानिस्तान, और मध्य एशिया के देशों में शक्ति-संघर्ष और गहराएगा।

इस ब्लॉग का उद्देश्य पाठकों को 1995 से लेकर वर्तमान तक अफगानिस्तान और पाकिस्तान में जिहादी राजनीति की जटिलताओं को समझाना है।

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