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Saturday, December 14, 2024

तुर्की की विदेशी फंडिंग और फिलिस्तीन की आजादी का सपना: एक कड़वा सच

तुर्की की विदेशी फंडिंग और फिलिस्तीन की आजादी का सपना: एक कड़वा सच

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अगर आप फिलिस्तीन की आजादी के समर्थक हैं, तो यह खबर आपका दिल तोड़ सकती है। वो देश जिसे आप 'खलीफा' मानते रहे हैं, जिससे आपको उम्मीद थी कि एक दिन वह इजराइल पर हमला करेगा, फिलिस्तीन को आजाद कराएगा और यरूशलम मुक्त करेगा, वो अब अमेरिकी डॉलर के बदले बिक चुका है। यह दावा मैं नहीं कर रहा, यह बात तुर्की के वित्त मंत्री ने स्वयं स्वीकार की है।

तुर्की के वित्त मंत्री ने घोषणा की है कि तुर्की को विदेशी फंडिंग मिलनी शुरू हो चुकी है, जिसने 7.7 बिलियन डॉलर का आंकड़ा पार कर लिया है। इस फंडिंग की सबसे बड़ी और नवीनतम किस्त 1.2 बिलियन डॉलर की, उस वक्त आई जब सीरिया में बशर अल असद की सरकार गिराई गई और ईरान के सैन्य बेसों को नष्ट किया गया। इसके तुरंत बाद, वर्ल्ड बैंक ने तुर्की के बैंक में 1.2 बिलियन डॉलर जमा किए।

इस घटनाक्रम के बाद, वित्त मंत्री ने घोषणा की कि वर्ल्ड बैंक तुर्की को आगे 660 मिलियन डॉलर देगा, जिससे देश के रेलवे और ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर को विकसित किया जा सके। इस साल के अंत तक, वर्ल्ड बैंक तुर्की को कुल मिलाकर करीब 5 बिलियन डॉलर दे चुका होगा। वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि आने वाले समय में तुर्की को और ज्यादा फंडिंग मिलेगी, जो उसकी गिरती हुई अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

लेकिन, सवाल उठता है कि यह फंडिंग कहां से आ रही है? वर्ल्ड बैंक को भले ही विश्व बैंक कहा जाता है, पर यह पश्चिमी देशों की एक मशीन है जो उनके वैश्विक प्रभाव को बढ़ाती है। वर्ल्ड बैंक की वोटिंग पावर को देखें, जहां अमेरिका, जापान, जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन की वोटिंग पावर सबसे ज्यादा है। यानी, वर्ल्ड बैंक जिस देश को अमेरिका चाहे, उसे ही फंडिंग देता है।

सीरिया में तख्तापलट के बाद तुर्की को मिली फंडिंग, यह दर्शाती है कि तुर्की ने क्या बेचा - सीरिया को। सीरिया में तख्तापलट तुर्की की मदद से ही हुआ। यह फंडिंग फिलिस्तीन के लिए भी एक झटका है क्योंकि सीरिया की जमीन से ही हमास और हिज्बुल्लाह को हथियारों की आपूर्ति की जाती थी। अब जब सीरिया की जमीन हाथ से निकल गई, तो फिलिस्तीन की लड़ाई भी कमजोर पड़ी है। 

इस प्रकार, तुर्की की वित्तीय सहायता का फिलिस्तीन पर प्रभाव बहुत नकारात्मक है। इससे यह साबित होता है कि कैसे अरब देश अपने आदर्शों को छोड़कर आर्थिक लाभ की ओर झुक जाते हैं। यह एक ऐसा कटु सत्य है जिससे हर फिलिस्तीन समर्थक को दो-चार होना पड़ता है।

ध्यान दें, यह पोस्ट 14 दिसंबर 2024 की स्थिति के अनुसार लिखी गई है।

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